#डच_उपनिवेश_की_स्थापना
हॉलैंड (वर्त्तमान नीदरलैंड) के निवासी डच कहलाते है। पुर्तगालियो के बाद डचों ने भारत में अपने कदम रखे। ऐतिहासिक दृष्टि से डच समुद्री व्यापार में निपुण थे। 1602 ईमें नीदरलैंड की यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गयी और डच सरकार द्वारा उसे भारत सहित ईस्ट इंडिया के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी।
#डचों_का_उत्थान
1605 ई में डचों ने आंध्र प्रदेश के मुसलीपत्तनम में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की। बाद में उन्होंने भारत के अन्य भागों में भी अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किये। डच सूरत और डच बंगाल की स्थापना क्रमशः 1616 और 1627 में की गयी थी। डचों ने 1656 ई में पुर्तगालियों से सीलोन जीत लिया और 1671 ई में पुर्तगालियों के मालाबार तट पर स्थित किलों पर भी कब्ज़ा कर लिया। पुर्तगालियों से नागापट्टिनम जीतने के बाद डच काफी सक्षम गए और दक्षिण भारत में अपने पैर जमा लिए। उन्होंने काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक लाभ कमाया। कपास, अफीम, नील, रेशम और चावल वे प्रमुख भारतीय वस्तुएं है जिनका व्यापार डचों द्वारा किया जाता था।
#डच_सिक्के
डचों ने भारत में रहने के दौरान सिक्कों की ढलाई पर भी हाथ आजमाए। जैसे जैसे उनके व्यापार में वृद्धि होती गयी उन्होंने कोचीन, मूसलीपत्तनम, नागापट्टिनम , पोंडिचेरी और पुलीकट में टकसालों की स्थापना की। पुलीकट स्थित टकसाल से भगवान वेंकटेश्वर (भगवान विष्णु) के चित्र वाले सोने के पैगोडा सिक्के जारी किये गए। डचों द्वारा जारी किये गए सभी सिक्के स्थानीय सिक्का ढलाई के नमूनों पर आधारित थे।
#डच_शक्ति_का_पतन
भारतीय उप-महाद्वीप पर डचों की उपस्थिति 1605 ई से लेकर 1825 ई तक रही थी। पूर्व के साथ व्यापार में ब्रिटिश शक्ति के उदय ने डचों के व्यापारिक हितों के प्रति एक चुनौती प्रस्तुत की जिसके परिणामस्वरूप दोनों के मध्य खूनी संघर्ष हुए। इन संघर्षों में स्पष्ट रूप से ब्रिटिशों की विजय हुई क्योकि उनके पास अधिक संसाधन थे। अम्बोयना में डचों द्वारा कुछ ब्रिटिश व्यापारियों की नृशंस हत्या ने परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। ब्रिटिशों द्वारा एक के बाद एक लगभग सभी डच क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया गया।
#मालाबार_क्षेत्र_में_डच_शक्ति_की_घोर_पराजय
डच-अंग्रेज संघर्ष के मध्य त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा द्वारा 1741 ई में कोलाचेल के युद्ध में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को पराजित करने के साथ ही मालाबार क्षेत्र में डच शक्ति का पूर्णतः पतन हो गया।
#ब्रिटिशों_के_साथ_संधियाँ_और_संघर्ष
हालाँकि 1814 ई की एंग्लो-डच संधि के तहत डच कोरोमंडल और डच बंगाल पुनः डच शासन के अधीन आ गए थे लेकिन 1824 ई में हस्ताक्षरित एंग्लो-डच संधि के प्रावधानों के तहत फिर से ब्रिटिश शासन के अधीन आ गए क्योकि इस संधि के तहत डचों के लिये 1 मार्च 1825 ई तक सारी संपत्ति और क्षेत्रों को हस्तांतरित करना बाध्यकारी बना दिया गया। 1825 ई के मध्य तक डच भारत में अपने सभी व्यापारिक क्षेत्रों से वंचित हो चुके थे। एक समझौते के तहत ब्रिटिशों ने आपसी अदला-बदली के तरीके के आधार पर खुद को इंडोनेशिया के साथ व्यापार से अलग कर लिया और बदले में डचों ने भारत के साथ अपना व्यापार बंद कर दिया।
#भारत_में_डेनिश_औपनिवेशिक_क्षेत्र
डेनमार्क से सम्बंधित किसी भी व्यक्ति या वस्तु को डेनिश कहा जाता है। डेनमार्क द्वारा लगभग 225 वर्षों तक भारत में अपने उपनिवेश बनाये रखे गए। भारत में स्थापित डेनिश बस्तियों मे त्रंकोबार (तमिलनाडु) ,सेरामपुर (पश्चिम बंगाल) और निकोबार द्वीप शामिल थे।
#डेनिश_व्यापारिक_एकाधिकार_की_स्थापना
एक डच साहसी मर्सलिस दे बोशौवेर ने भारतीय उप-महाद्वीप में डेनिश हस्तक्षेप के लिए प्रेरणा प्रदान की। वह सहयोगी दलों से सभी तरह के व्यापार पर एकाधिकार के वादे के साथ पुर्तगालियों के विरुद्ध सैन्य सहयोग चाहता था। उसकी अपील ने डेनमार्क-नॉर्वे के राजा क्रिस्चियन चतुर्थ को प्रभावित किया जिसने बाद में 1616 ई में एक चार्टर जारी किया जिसके तहत डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी को डेनमार्क और एशिया के मध्य होने वाले व्यापार पर बारह वर्षों के लिए एकाधिकार प्रदान कर दिया गया।
#डेनिश_चार्टर्ड_कंपनियां
दो डेनिश चार्टर्ड कंपनियां थी। प्रथम कंपनी डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी थी ,जिसका कार्यकाल 1616 ई से लेकर 1650 ई तक था। डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी और स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से ज्यादा चाय का आयात करती थीं और उसमे से अधिकांश को अत्यधिक लाभ पर अवैध तरीके से ब्रिटेन में बेचता था। इस कंपनी का 1650 ई में विलय कर दिया गया। दूसरी कंपनी 1670 ई से लेकर 1729 ई तक सक्रिय रही । 1730 ई में एशियाट
[02/02, 6:31 PM51त_ने_2009_मे_भाग_लिया_था_अब
#_वर्ष_2021 में पीसा (PISA) में भाग लेगा भारत
भारत 2021 में प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट (पीसा) में हिस्सा लेगा जिसमें 15 साल के बच्चों के सीखने के स्तर का मूल्यांकन किया जाता है।
मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय ने 28/01/19को इस संबंध में ओईसीडी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है।
#_ओईसीडी हर तीन साल पर पीसा का आयोजन करती है। उसने भारत की भागीदारी की पुष्टि की।
वह त्रैवाॢषक सर्वेक्षण करता है जिसमें पाठन, गणित, विज्ञान और सहयोगी समस्या समाधान में छात्रों की बुद्धिमत्ता का आकलन किया जाता है।
केंद्रीय एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस अवसर पर कहा,
‘‘भारत 2021 में पीसा में हिस्सा लेगा। इस हिस्सेदारी से शिक्षा प्रणाली के हाल का आकलन होगा और स्कूलों एवं राज्यों को लगातार प्रेरणा मिलती रहेगी।’’
#_इस_कार्यक्रम_में भारत की तरफ से केंद्रीय विद्यालय संगठन (-KVS), नवोदय विद्यालय समिति (NVS) द्वारा संचालित विद्यालय तथा केंद्रशासित क्षेत्र चंडीगढ़ के विद्यालय भाग लेंगे।
#_पहली_बार_आयोजन
अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम (PISA) का आयोजन पहली बार वर्ष 2000 में किया गया था।
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) द्वारा समन्वित यह एक त्रैवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण है
वर्ष 2000 में आयोजित परीक्षण के पहले दौर के बाद से 44 मध्यम आय वाले देशों सहित 80 से अधिक देशों ने इस मूल्यांकन में भाग लिया है।
भारत ने 2009 के परीक्षण के "विस्तारित चक्र" में अपनी शुरुआत की, जिसमें हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के 400 स्कूलों के 16,000 छात्रों ने भाग लिया। तब भारत को भाग लेने वाले 74 देशों में #72वें स्थान पर रखा गया था।
#_वर्ष_2021 में आयोजित होने वाले PISA हेतु पंजीकृत देशों की सूची में ब्राज़ील, चीन (शंघाई और बीजिंग जैसे कुछ क्षेत्र), तथा दक्षिण एशिया के थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम जैसे देश शामिल है
[02/02, 6:35 PM] +91 94151 51128: #संभावनाओं से भरा एक संबंध
भारत तथा दक्षिण अफ्रीका के पारस्परिक संबंधों की जड़ें इतिहास की गहराइयों तक फैली हुई हैं.
चूंकि दोनों देशों की कहानियां कई उतार-चढ़ावों से होकर गुजरी हैं, इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इन दोनों देशों के संबंध स्नेह और सहानुभूति से सहेजे जायें, ताकि दोनों के बीच का बंधन और भी प्रगाढ़ हो सके.
हालांकि, आधुनिक युग एवं खासकर वर्तमान कालखंड में इन दोनों के बीच का जुड़ाव तेजी से परवान चढ़ा है, जिसमें इस तथ्य का एक बड़ा योगदान है कि प्रधानमंत्री पद पर आने के पश्चात नरेंद्र मोदी दो बार दक्षिण अफ्रीका की यात्रा कर चुके हैं.
चूंकि पूरा विश्व इस वर्ष महात्मा गांधी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है, इसलिए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर नयी दिल्ली में होनेवाले मुख्य राजकीय समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में सुशोभित करने का उन्हें दिया गया आमंत्रण स्वीकार कर लिया.
पिछले वर्ष के अंत में अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में संपन्न जी20 शिखर सम्मेलन में जब दोनों नेता मिले, तो उन्होंने मोदी को अपनी इस स्वीकृति की सूचना दी.
वैसे इस अवसर पर मुख्य अतिथि बनने हेतु पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आमंत्रित किया गया था, पर उन्होंने व्यस्तताओं की वजह से इसे स्वीकारने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी.
यह भी बताया गया है कि राष्ट्रपति रामफोसा ने वाराणसी में चल रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन में भी सहभागी होना स्वीकार किया है.
प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत आने की स्मृति में और विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों के योगदान का जश्न मनाने हेतु किया जाता है.
राष्ट्रपति रामफोसा दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा के त्यागपत्र देने के बाद सत्ता में आये थे, जिसके पश्चात वहां घोटालों तथा कुशासन के एक युग का अंत संभव हो सका, क्योंकि जुमा प्रशासन पर भ्रष्टाचार, धन शोधन तथा रिश्वतखोरी के कई आरोप लगे थे.
भारत और अफ्रीका के संबंध सदियों पीछे प्रारंभ हुए और भारत ने रंगभेद के विरुद्ध उसके लंबे आंदोलन में भी उसका साथ दिया.
आज दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लगभग 15 लाख लोग निवास करते हैं, जो वहां की जनसंख्या का लगभग 3 प्रतिशत है.
दोनों देश आपस में तो अत्यंत निकट तथा सद्भावपूर्ण द्विपक्षीय संबंध साझा करते ही हैं, यह संबंध कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों की साझी सदस्यता तथा उनमें दोनों के सक्रिय सहयोग तक भी विस्तृत है.
इसके उदाहरण में आइबीएसए (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) एवं ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन एवं दक्षिण अफ्रीका) जैसे संगठनों को लिया जा सकता है.
वर्ष 2018 में ब्रिक्स का दसवां शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में ही आयोजित हुआ था, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने शिरकत की.
इस सम्मेलन में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में शांति तथा प्रगति हेतु भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर बल दिया था.
दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से एक डाक टिकट भी जारी किया, जिसे गांधी एवं मंडेला की विरासत के सम्मान में निकाला गया था.
इसके पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2016 में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की थी, जहां उन्होंने आठ समझौतों को अंतिम रूप देते हुए सूचना संचार प्रौद्योगिकी, पर्यटन, खेल, संस्कृति, आधारभूत नवोन्मेष, नवीकरणीय ऊर्जा, दृश्य-श्रव्य तथा वीजा सरलीकरण प्रक्रिया के क्षेत्रों में परस्पर सहयोग के विस्तारीकरण की शुरुआत की थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण अफ्रीका को ‘मदीबा (नेल्सन मंडेला) के देश’ तथा ‘महात्मा गांधी की कर्मभूमि’ की संज्ञा दी.
इस अवसर पर उन्होंने भारतीय समुदाय को भी संबोधित किया और यह भी उजागर किया कि पिछले दस वर्षों में दोनों राष्ट्रों के बीच उभयपक्षीय व्यापार में 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो स्पष्ट तौर पर दक्षिण अफ्रीका में भारत की तीव्र व्यापारिक दिलचस्पी का संकेत करती है.
अब राष्ट्रपति रामफोसा द्वारा भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में प्रतिभागिता स्वीकार करने से दक्षिण अफ्रीका के साथ हमारे संबंधों के पहले से भी ज्यादा मजबूत बनने की आशाएं उज्ज्वल हो गयी हैं.
दोनों देशों के लिए यह एक और ऐसा मौका है, जब वे कई अतिरिक्त क्षेत्रों में सहयोग के संबंध में विचार-विमर्श कर सकते हैं.
रामफोसा द्वारा स्वास्थ्य, कौशल विकास तथा डिजिटल क्षेत्रों को उन प्राथमिकताओं के अंतर्गत रखा गया है, जिनमें वे भारत के साथ संबंध बढ़ाना चाहते हैं.
रामफोसा नयी दिल्ली में भारतीय कारोबारी समुदाय से भी इस मुद्दे पर विचार-विमर्श हेतु मिलेंगे कि भारत किस तरह दक्षिण अफ्रीका के सहयोग से अफ्रीका के अन्य देशों से भी अपने व्यापारिक संबंधों का संचालन तथा उनका विकास कर सकता है.
हम यह आशा कर सकते हैं कि राष्ट्रपति रामफोसा की भारत यात्रा दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के संबंधों को और भी अधिक गहराई देते हुए दोनों देशों के लिए फलप्रद होगी, क्योंकि इस साझेदारी में अपार संभावनाएं छिपी हैं. यह अवसर दोनों देशों के बीच कारोबार के साथ ही दोनों देशों की जनता के बीच के संबंधों की बढ़ोतरी के लिए भी स्वर्णिम सिद्ध हो सकेगा.

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