Friday, 22 February 2019

*सिंधु जल समझौता*
1960 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने सिंधु जल संधि की थी. इस संधि के मुताबिक़ सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में बांटा गया था ।

समझौते में सिंधु, झेलम और चेनाब का पानी पाकिस्तान को दिया गया और रावी, ब्यास, सतलज का पानी भारत को दिया गया ।

इसमें ये भी था कि भारत अपनी वाली नदियों के पानी का, कुछ अपवादों को छोड़कर,बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है । वहीं पाकिस्तान वाली नदियों के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को भी दिया गया था,जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी ।

पाकिस्तान भारत की बिजली से पैदा की जाने वाली बिजली की बड़ी परियोजनाओं पर आपत्ति उठाता रहा है ।

वहीं भारत के कश्मीर और पंजाब में वहां के जल संसाधनों का इन राज्यो को लाभ नहीं मिलने की बात अक्सर कही जाती रही है. बल्कि अबकी बार जब बीजेपी के समर्थन से महबूबा मुफ़्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने खुद कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है और केंद्र उसकी भरपाई के लिए क़दम उठाए ।

पाकिस्तान के पंजाब और सिंध इलाके को कृषि के लिए यहीं से पानी मिलता है. पाकिस्तान के ज़्यादातर इलाके के लिए सिंचाई का यही ज़रिया है. पाकिस्तान की इंडस्ट्री और शहरों की बिजली के लिए भी ये समझौता बहुत मायने रखता है ।

• समझौते के मुताबिक कोई भी एकतरफ़ा तौर पर इस संधि को नहीं तोड़ सकता है या बदल सकता है.

• लेकिन जानकार कहते हैं कि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की के अंतर्गत यह कह कर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकी गुटों का उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है ।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी कहा है कि अगर मूल स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है. लेकिन ये सब कहने जितना आसान नहीं ।

• बंटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली नदियों पर हुए विवाद की मध्यस्थता वर्ल्ड बैंक ने की थी. लिहाजा यदि भारत यह समझौता तोड़ता है तो पाकिस्तान सबसे पहले विश्व बैंक के पास जाएगा. और विश्व बैंक भारत पर ऐसा नहीं करने के लिए दबाव बना सकता है ।

फिर जिस तरह से चीन का खुला समर्थन पाकिस्तान के साथ है तो चीन अवश्य ही इसके जवाब में ब्रह्मपुत्र नदी का भारत की तरफ उसका बहाव रोक कर बदला ले सकता है !

सिंधु जल समझौता अथवा सिंधु जल संधि पर काफी लंबे समय से भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद जारी है ये कोई आज का या अभी का मसला नही है ।

सिंधु जल समझौता पाकिस्तान के लिए काफी अहम है. इस समझौते के तहत भारत पाकिस्तान को करीब 80 फीसदी पानी देता है ।

पाकिस्तान में इमरान खान के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद भी इसके लिए कई बैठकों का दौर चल चुका है. और भारत और पाकिस्तान के बीच पहली द्विपक्षीय वार्ता के रूप में सिंधु जल संधि को ही चुना गया था . हालांकि, अब पाकिस्तान का आतंकवाद को लेकर जिस तरह का रवैया है, उससे लग नहीं रहा है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच फिलहाल कोई आम सहमति बन पाएगी. भारतीय जल आयोग का एक प्रतिनिधिमंडल सिंधु जल संधि के विभिन्न पहलुओं पर अपने समकक्षों से महत्वपूर्ण बातचीत करने के लिए पाकिस्तान पहुंचा था । इमरान खान के 18 अगस्त को प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच यह पहली अधिकारिक वार्ता थी. पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री बनने पर इमरान खान को लिखे पत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों देशों के बीच अच्छे पड़ोसियों के संबंध बनाने का भारत का संकल्प व्यक्त किया था ।

दरअसल, पाकिस्तान की इमरान सरकार भी समझ रही है कि उसके मुल्क के लिए सिंधु समझौता कश्मीर समझौते से भी काफी अहम है. क्योंकि कश्मीर के तो त्वरित दुष्परिणाम सामने नहीं आएंगे, मगर सिंधु समझौते पर अगर भारत सरकार का रुख कड़ा हुआ और भारत वैश्विक दबावों को दरकिनार कर सिंधु के पानी को रोक देता है, तो पाकिस्तान को इसके त्वरित दुष्मारिणामो से गुजरना पड़ेगा और यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी साबित होगी. भारत अगर इस समझौते को तोड़ देता है तो पाकिस्तान का हलक सूख जाएगा हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर एकमत नहीं हैं कि सिंधु नदी समझौते को तोड़ा जा सकता है या नहीं. मगर इतना तय है कि अगर भारत यह फैसला लेता है तो पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत हो जाएगी. मगर वर्तमान हालातों को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार कोई ऐसा फैसला अब लेगी. गडकरी जी इस बाबत ट्वीट भी कर चुके है पर अपनी तरफ के पानी को रोकने के लिए कुछ बांधों और नहरों की जरूरत होगी जिसमें कुछ साल लग सकते है , फिर भी इस घोषणा से पाकिस्तान की जान सांसत में तो आ ही गयी है ।

No comments:

Post a Comment