Wednesday, 27 February 2019

 *संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम से भिन्न राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों कहे जाने वाले* कुछ क्षेत्र (फिर चाहे ये क्षेत्र किसी राज्य में हों अथवा संघ शासित क्षेत्र में) के प्रशासन हेतु कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं।

ऐसा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों के पिचादेप्न को अधर बना कर किया गया है।

किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का अधिकार संविधान द्वारा राष्ट्रपति को प्रदान किया गया है, किंतु ऐसा वह संसद द्वारा पारित विधान के अधीन रहते हुए ही कर सकता है।

इसके अतिरिक्त वह किसी भी समय किसी भी क्षेत्र के अनुसूचित क्षेत्र के स्तर को समाप्त कर सकता है।

अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन से सम्बन्धित विशेष प्रावधान संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत किए गए हैं।

 *अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन*

अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के सम्बन्ध में संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार इन क्षेत्रों से सम्बन्धित राज्यों को प्रशासन सम्बन्धी आवश्यक निर्देश देने तक ही होगा।

अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्य का राज्यपाल प्रतिवर्ष अथवा मांगे जाने पर उक्त राज्य के अनुसूचित क्षेत्र के प्रशासन सम्बन्धी अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

वह चाहे तो सम्बन्धित राज्य के राज्यपाल से विचार-विमर्श करके किसी भी अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्रफल में वृद्धि कर सकता है, उनके सीमा क्षेत्र में परिवर्तन कर सकता है तथा उसके पुनर्निर्धारण के आदेश प्रेषित कर सकता है।

 *राज्यपाल की कानून निर्माण संबंधी शक्तियां*

राज्यपाल को यह प्राधिकार है कि वह कभी भी संबद्ध क्षेत्र में कल्याण एवं शांति हेतु निर्देश दे सकता है।

वह अनुसूचित क्षेत्र के लोगों के बीच परस्पर भूमि के आदान-प्रदान या स्थानांतरण पर प्रतिबंध लगा सकता है।

वह भूमि के आबंटन पर नियंत्रण संबंधी निर्देश दे सकता है।

वह उन व्यावसायिकों व ऋणदाताओं को इन क्षेत्रों के अनुसूचित जनजातियों के लोगों को उधार न देने संबंधी कानून बना सकता है।

इसके अतिरिक्त वह राष्ट्रपति की सहमति से संसद या विधान सभा द्वारा आरोपित, कुछ समय के लिए प्रभावी कानून को संशोधित कर सकता है या समाप्त कर सकता है।

वस्तुतः राज्यपाल द्वारा किसी भी प्रकार के कानून निर्माण इत्यादि के लिए राष्ट्रपति की अनुमति अत्यंत आवश्यक है।

 *जनजातीय सलाहकार परिषद्*

संविधानतः अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं उन्नति संबंधी ऐसे विषयों पर परामर्श प्रदान करने हेतु, जो उसे राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, जनजातीय सलाहकार परिषदों का गठन किया जाएगा (अनुसूची-V)।

इस परिषद में 20 से अधिक सदस्य नहीं होंगे तथा जिनमें से तीन-चौथाई राज्य विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि होंगे।

यदि राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधियों की संख्या परिषद में भरे जाने वाले पदों की संख्या से कम होगी तो शेष पदों को उन क्षेत्रों के अन्य सदस्यों से भरा जाएगा।

 *इस संबंध में राज्यपाल को निम्नलिखित नियम बनाने का प्राधिकार है-*

परिषद की सदस्य संख्या उनके अध्यक्ष व अन्य अधिकारियों की नियुक्तियों की विधि तथा नियम

परिषद की विभिन्न सभाओं का संचालन तथा सामान्यतः इसकी कार्य-प्रक्रिया, तथा

अन्य आकस्मिक विषयादि।

यह सलाहकारी परिषद राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण व विकास हेतु अपनी महत्वपूर्ण सलाह प्रदान करती है।

 *पांचवीं अनुसूची में संशोधन*

संसद समय-समय पर इस अनुसूची के किसी भी प्रावधान को विधि द्वारा संशोधित व समाप्त कर सकती है।

जब अनुसूची का इस प्रकार संशोधन किया जाता है तब इस संविधान में इस अनुसूची के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस प्रकार संशोधित ऐसी अनुसूची के प्रति निर्देश है।

अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए इसे संविधान का संशोधान नहीं माना जाएगा।

अनुसूचित क्षेत्रों एवं उनके प्रशासन का उल्लेख संविधान की 5वीं अनुसूची में तथा जनजातीय क्षेत्रों एवं उनके प्रशासन का उल्लेख 6वीं अनुसूची के अंतर्गत किया गया है।

अनुसूचित क्षेत्रों के निर्धारण का अधिकार राष्ट्रपति को है।

 *जनजातीय क्षेत्र*

संविधान के अनुच्छेद-244(2) के अंतर्गत असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के सम्बन्ध में व्यवस्था और उनके प्रशासन सम्बन्धी आवश्यक प्रावधानों का उल्लेख संविधान की 6वीं अनुसूची के अंतर्गत की गई है।

 *जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन*

6वीं अनुसूची में वर्णित असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्र स्वशासी जिले के रूप में प्रशासित किए जाएंगे।

ये स्वशासी जिले राज्य सरकार के कार्यपालक प्राधिकार के बाहर तो नहीं हैं किंतु कुछ विधायी  एवं न्यायिक कृत्यों के प्रयोग के लिए जिला परिषद एवं प्रादेशिक परिषदों के सृजन का प्रावधान किया गया है।

ये परिषदें प्राथमिक रूप से पृथक् निकाय हैं और उन्हें कुछ विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में विधान बनाने की शक्ति है, जैसे- आरक्षित वन से भिन्न वनों का प्रबन्ध, सम्पत्ति की विरासत, विवाह, सामाजिक रीति रिवाज, आदि।

इसके अतिरिक्त इन परिषदों को भू-राजस्व के निर्धारण एवं संग्रहण की तथा कुछ विनिर्दिष्ट कर आरोपित करने की शक्ति भी प्राप्त है।

इन परिषदों द्वारा बनाई गई कोई भी विधि राज्यपाल की अनुमति के बिना प्रभावी नहीं होगी।

जिन विषयों के सम्बन्ध में विधि निर्माण हेतु जिला एवं प्रादेशिक परिषदों को अधिकृत किया गया है, उन विषयों से सम्बन्धित राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए अधिनियम तब तक जनजातीय क्षेत्रों पर लागु नहीं होंगे जब तक कि सुसंगत जिला  परिषद् एक लोक अधिसूचना जारी करके तत्सम्बन्धी निदेश जारी न करे।

जिला एवं प्रादेशिक परिषदों को न्यायिक, सिविल एवं दांडिक शक्तियां प्राप्त होंगी और वे उच्च न्यायालय की अधिकारिता के इस प्रकार अधीन होंगी जो राज्यपाल समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे।

संविधान के अंतर्गत असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिजोरम राज्य जनजातीय क्षेत्र घोषित किए गए हैं।

ये जनजातीय क्षेत्र राज्य सरकार के कार्यपालक प्राधिकार के अधीन स्वशासी जिले के रूप में प्रशासित किए जाते हैं।

इन स्वशासी जिलों में जिला परिषद एवं प्रादेशिक परिषदों के गठन का प्रावधान संविधान में किया गया है।

परिषदों को न्यायिक, सिविल एवं दाण्डिक शक्तियां प्राप्त होती हैं।

‬: *Part-3* 

 *मौलिक अधिकार के विकासात्मक चरण*

अंग्रेजो ने सन 1215 मेँ इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज से नागरिकों के मूल अधिकारोँ की सुरक्षा प्राप्त की थी, यह अधिकार-पत्र मूल अधिकार से संबंधित प्रथम लिखित दस्तावेज है।

सन 1215 के मैग्ना कार्टा ,1679 के बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम, सन 1689 के बिल ऑफ राइट्स, सन 1776 की अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा तथा 1789 की मानव अधिकार की फ्रांसीसी घोषणा इत्यादि मानव अधिकारोँ की मूल समस्या के समाधान मेँ मील का पत्थर हैं।

वर्तमान समय मे समाचार-पत्र मेँ छपे लेख एवं पोस्टकार्ड तक को रिट मानकर उच्चतम न्यायालय ने दीन दुखियों की पीड़ा को हरने का बीड़ा लिया है।

राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 359 के अधीन मौलिक अधिकारोँ को निलंबित कर सकता है।

 *स्मरणीय तथ्य*

सर्वप्रथम मौलिक अधिकारोँ की मांग कांग्रेस द्वारा अपने बंबई अधिवेशन मेँ उठाई गयी।

इस अधिवेशन के अध्यक्ष हसन इमाम थे।

कांग्रेस ने कराची अधिवेशन 1931 मेँ प्रस्ताव किया की भारतीय संविधान मेँ मौलिक अधिकारोँ की आवश्यक सूची को शामिल किया जाना चाहिए, इससे पूर्व नेहरु कमेटी ने 19 मौलिक अधिकारोँ का उल्लेख अपनी रिपोर्ट मेँ किया था।

संपत्ति का अधिकार पहले एक मौलिक अधिकार था लेकिन 44 वेँ संविधान संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा इसे मौलिक अधिकारोँ की श्रेणी से निकाल कर एक कानूनी अधिकार बना दिया गया।

मैग्ना कार्टा अधिकारों का वह प्रपत्र है जिसे इंग्लैण्ड के किंग जॉर्ज द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया, यह नागरिकोँ के मूल अधिकारो से संबंधित पहला लिखित प्रपत्र था।

भारत मेँ सभी व्यक्तियोँ (नागरिकोँ एवं विदेशियोँ) को दिए जाने वाले मूल अधिकार अनुच्छेद 14, 21, 23, 25, 27 और 28 मेँ समाहित हैं।

अस्पृश्यता को संविधान मेँ परिभाषित नहीँ किया गया है।

1954 मेँ भारत सरकार ने चार प्रकार के नागरिक सम्मान प्रारंभ किए - भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री।

भारत सरकार द्वारा प्रदान उपाधियां भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री आदि को जनता पार्टी सरकार ने 1977 मेँ समाप्त कर दिया गया था, जो कि 1980 मेँ फिर चालू हो गया।

जब अनुच्छेद 352 के अधीन आपात उद्घोषणा की जाती है तो अनुच्छेद 19 निलंबित हो जाता है।

गिरफ्तार अथवा हिरासत मेँ लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय मेँ आवश्यक समय के अतिरिक्त ऐसी गिरफ़्तारी से 24 घंटे की अवधि मेँ निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।

इन 24 घंटो मेँ यात्रा मेँ लगा समय शामिल नही होता।

राष्ट्रपति के विशेष अधिकार द्वारा अनुच्छेद 20 व 21 मेँ निहित अधिकारोँ को छोडकर अन्य समस्त मौलिक अधिकारोँ को निलंबित किया जा सकता है।

50वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 33 का विस्तार कर इंटेलिजेंस, दूरसंचार तथा पैरा मिलिट्री के सदस्योँ को भी इसमेँ सम्मिलित कर लिया गया।

अनुच्छेद 359 के द्वारा राष्ट्रपति घोषणा कर सकता है, कि जब तक आपातकाल की घोषणा जारी रहैगी तब तक मौलिक अधिकार निलंबित रहेंगे।

मौलिक अधिकारोँ का उल्लंघन होने पर सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय मेँ अपील की जा सकती है।

निवारक निरोध कानून के तहत किसी व्यक्ति को अपराध करने के पूर्व ही गिरफ्तार किया जा सकता है।

संवैधानिक उपचारोँ का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारोँ के लिए प्रभावी कार्यविधियां प्रतिपादित करता है।

इसलिए इसको संविधान की आत्मा कहा जाता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1932 के गोल मेज सम्मेलन मेँ मांग रखी थी की भारत के लिए जो संविधान बनाया जाए उसमेँ भाषाई और धार्मिक स्वतंत्रताएं अवश्य शामिल की जाएं।

1945 में तेज बहादुर सप्रू समिति के प्रस्तावोँ मेँ दो प्रकार के अधिकारोँ की चर्चा थी - न्याय योग्य अधिकार और वाद योग्य अधिकार।

संविधान सभा मेँ मूल अधिकारोँ की उप-समिति ने जो प्रारुप सूची फरवरी 1948 को तैयार की मूल अधिकारोँ का वही प्रारुप संविधान मेँ शामिल किया गया।

संसद मेँ अनुच्छेद 35 के अंतर्गत अस्पृश्यता निवारक अधिनियम, 1955 को 1976 मेँ संशोधित करते हुए अस्पृश्यता बरतने पर कैद और कठोर दंड की व्यवस्था की।

अनुच्छेद 19 को सभी मूल अधिकारोँ मेँ आवश्यक अथवा मूल अधिकार के अध्याय का केंद्र कहा गया है।

पिछड़े वर्गों के लिए 1953 मेँ काका कालेकर आयोग की स्थापना की गई थी, जिसने सन 1955 में अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी।

इस रिपोर्ट सरकार 2399 जातियों को सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई माना गया था, जिनमे 837 जातियां अत्यधिक पिछड़ी हुई थीं।

 *1 जनवरी, 1979 को मंडल आयोग की स्थापना की गई।*

 वी. पी. मंडल को इस आयोग के अध्यक्ष थे।

मंडल आयोग ने 31 दिसंबर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी।

इस रिपोर्ट में 3743 जातियों को पिछड़ा हुआ माना गया था।

मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 13 अगस्त, 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व मेँ केंद्रीय सरकार ने एक कार्यालय ज्ञापन निकाला तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिए 27 प्रतिशत अतिरिक्त स्थान आरक्षित कर दिए गए।

अनुच्छेद 18 केवल निर्देशात्मक है, आदेशात्मक नहीँ है

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